जवान!

एक अरसे के बाद लिख रहा हूं,
भूल नहीं गया मैं बस तेरी याद में छिप रहा हूं,
निकलती हैं रोशनी तो खतम होती है अंधेरे से,
शायद तेरी दूरी से बहोत जल रहा हूं।
कभी निकलकर आता हूं और तुम में समेट जाता हूं,
तेरी गरमी की आहट नहीं मिलती यहाकी बर्फ में,
गुजरते गुजरते दीन तड़पकर निकल जाता हैं,
पर कभी इस बर्फ के पत्थर की तरह पिघल जाता हूं।
तुम्हारे बिना कुछ अच्छा नहीं लगता,
बस तुम्हें मिलने की ख्वाइश में ये सांसे चलती रहती हैं,
मेरा दिल पतंग की डोर के बिना कैसे उड़ेगी,
तेरे साथ इस आसमान में लहराना चाहता हूं।
जब वक्त आएगा तो तुम मुझे गोदमे जरूर लेना,
तुम्हारी मिट्टी की सुगंध में जरूर सो ना चाहूंगा,
तेरे कर्ज का और मेरे फर्ज का हिसाब,
सबको गर्व से और गौरव से बतलाना चाहता हूं।
भारत मां का जवान
लहराते इस तिरंगे के समान
सम्मान सम्मान सम्मान चाहता हूं।
जय हिंद जय भारत।

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